क्षति

बात वैसे कुछ और करनी थी आज; दिल कही और चला गया और कविता का सर भी बदल गया।

अब ज़िक्र कर ही लिया है, तो आज किसीकी तार्रुफ़ आपसे क्यों न कर दू!
जिनकी बात हो रही है, वह शख्स को न गुस्से में भी कम प्यार किया जा सकता है,
न उनकी बेवफा आदतों से मुझे होने वाली नफरत के तले दफनाया सकता है।
उनको प्यार तो किया जा सकता है, पर उसका मतलब उनको नहीं समझाया जा सकता;
ये वह है, जिसको न अकेलापन मंज़ूर है, न जिसको वादों से बना सच्चा रिश्ता।

वादें तो उनके लिए जैसे जेब में बचे-कूचे अट्ठनी के बराबर,
किसको, कब, कहा वह अट्ठनी के सौदे कर आते, क्या हिसाब!
आसान थोड़ी था हमारे लिए वादों के मोल गिरा देना — इश्क़ करना था, बुजदिली नहीं।
हम सोचते रहे वह वादें निभा रहे है, एकाद गलती हुई तो भी क़्या?
सच ये था के गलतिओ के बीच-बीचमे वह वादों के बहाने बना रहे थे।

जिससे इतने एहसास मिले हो जो पहले कभी महसूस ही नहीं हुए,
उनपे जल्दी से शक आता नहीं था,
तब ऐसे ही लगता की गलती तो हमारी ही होगी,
और वह उसपे सहमत भी होते रहे।

आया जब थोड़ा अंदाजा,
के ना तो वह प्यार के नियत में है न वफाई के,
तब बने हम होशियार और रखदी ये शिकायत उनके सामने।
कैसे-कैसे पैंतरे देखे हमने इस चक्कर में, क्या बताये,
एक ऐसा वक़्त आया की खुदसे विश्वास ही उठ गया क्युकी इन सब के बाद भी,
उन परसे वह प्यार ही ख़तम नहीं हो रहा था…शायद सच्चा रहा होगा।

वह अपने चाल चलते रहे, हम सबकुछ जानकार भी उन्हें मोहलतें देते रहे,
बेवकूफी नहीं थी, हमारे लिए ठाने हुए आखरी लम्हे थे वह उनके साथ, बस जी भरके जीने थे।
हर दो दिन में बदलते हुए उनके हमारी लिए नीयत को अंजाम अब हम देने वाले थे;
जब सेहेन कर रहे थे तो वह अपने आप को खुसनसीब मानते रहे,
कोई ताज्जुब की बात नहीं के हमारे रूठके जाने के बाद हमारी हाल-चाल तो दूर की बात,
ऐसे मुकाम पे छोड़ने के बाद भी हमपे उंगलियां उठाने लगे।

छोड़ो यार,
कितनोंके ग़म सर पे ले रखे है, एक और ही सही।

जो तारो के सपने दिखाके तारो जैसा तोड़ जाए,
वैसी छाई सियाही की भी हमें मंज़ूरी।
ये जनम साथ बिताने की जिसकी बात थी,
दो पल भी उसे न निभाने की उनकी नाकामी की भी हमें मंज़ूरी।

छोड़ो यार,
कितनोंके रंजिश को भी ख़ुशी ख़ुशी अपनाया है, एक और ही सही।

जितने दर्द भुला दो, उतने काम रहेंगे शिकायतें,
छोडो यार,
शायद हम बोहोत के शिकायत बन चुके है,
और अब उनके बने, तो वह भी सही।​

 

 

 

 

Lots of Love, 

Madhvi Panchal

PAGE VIEWS: 5

5 thoughts on “क्षति”

  1. Awesome Madhavie,
    बस आशा करता हु कि कही ऐसी हि कोई एक कविता उनके पास (आप के लिए)ना हो; जिनकी एकतर्फा बेवफाई हि आपकी कविता में सांची जान सी लाई !!

  2. Jinke pyar ko hum khuda samajh pade the,
    Jinke hansi ko hum jannat samjah bhethe the,
    Jinki sans main hum Zindagi basa chuke the,
    Aaj woh deewane hoke kisi aur k sanson main Zindagi basa Chuke hai..
    Ya Allah, usnko jannat jarur dena..
    Hum bus usime Khushi dhund lenge.. 🙂

    My eyes finished reading ur poem by my mind went ahead and pen down wot my heart felt..

    Loads of love 🖤

    One & only..

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